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परम पूज्य जैन आचार्य १०८ श्री विद्यासागर जी महाराज के परम शिष्य पूज्य मुनि १०८ श्री प्रमाण सागर जी महराज ने मीट बैन पर जैन समुदाय हेतु यह व्यवस्था दी है :-

सोशल मीडिया / प्रिंट मीडिया / अन्य स्थानों पर इस विषय में पक्ष अथवा विपक्ष में वाद विवाद ना करें .. हमें जो कहना था वो सरकार से कह दिया और सरकार ने व्यवस्था दी है ... अब सरकार का कर्त्तव्य है कि अपने नियम का पालन कराये या ना कराये ... अहिंसा प्रत्येक प्राणी के लिए हितकारी भावना है परन्तु अन्य समाज में जिसे जो उचित लगता है वो वैसा करे ... जैन समाज को इस विषय में हो रही चर्चा में तटस्थ रहना चाहिए ..

मुनि श्री ने ऐसा आदेश पारस चैनल पर आज के शंका समाधान कार्यक्रम में दिया ..

 

 

 

मांस बिक्री पर प्रतिबन्ध – कुछ आवश्यक पहलु
एक दो शहरों में मांस की बिक्री बंद होने पर हमारा दंभ (arrogance) एवं अन्य कई समुदायों तथा मीडिया की प्रतिक्रिया काफी चिंता का विषय है l
 
हमें हर स्थिति में यह ध्यान रखना है कि हम कहीं समस्या का हिस्सा तो नहीं बन जा रहे हैं, या जिसे हम समाधान समझ रहे हैं, कहीं वो किसी बड़ी समस्या को तो नहीं पैदा कर देगा? एक अल्पसंख्यक (minority) समाज होने के नाते हमें इस बात का भी ध्यान रखना है कि कहीं हम राजनितिक सतरंज के मोहरे ना बन जाएं या स्वयं मुद्दा ना बन जाएं l हमारी स्थिति खरबूजे जैसी है – छूरी खरबूजे पर गिरे, या खरबूजा छूरी पर – कटना हर हाल में खरबूजे को ही है l
 
नेमिनाथ भगवान् का वैराग्य प्रसंग याद आता है l वो राजुल से शादी हेतु बारात ले कर जा रहे हैं l अचानक उनके कान में पशुओं की चीत्कार (painful cries) सुनाई पड़ती है l पूछने पर पता चलता है शादी में मांसाहार की व्यवस्था है l क्या वो ज्ञान देने में ही उलझ जाते हैं या विरक्त (Passionless ) भाव से वहाँ से चले जाते हैं आत्म कल्याण के लिए?
 
जैन यानि सहजता या सरलता l एक ऐसा व्यक्तित्व जो किसी के लिए बाधा नहीं बनता, किसी के लिए रोड़े (obstacle) नहीं अटकाता l जो अपने काम से काम रखता है l पर में कर्तत्व (doer), ममत्व (attached) या भोक्तत्व (consumption) का भाव नहीं रखना हमारा ध्येय है l फिर हम अनावश्यक विवादों में इस भ्रान्ति (illusion) के साथ क्यों उलझ रहें हैं जैसे सारी दुनिया को बदलने का दायित्व (responsibility) हमने ही ले रखा है l
 
एक सांप अगर मेंढक को खा रहा हो तो जैन धर्म सांप को पत्थर मारने की बात नहीं करता है l हमें शांति से णमोकार मन्त्र पढना है और वीतरागी भाव से चले जाना है l हमें सांप से भी नफरत नहीं करनी है l सब अपने अपने कर्मों के अनुसार परिणमन कर रहे हैं l हमें अपना भाव नहीं बिगाड़ना है l
 
वस्तु स्वातंत्रय (independence of each element ) या यह आस्था कि एक द्रव्य दुसरे द्रव्य का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता या उसमे कुछ हेर-फेर नहीं कर सकता – यह जैन संस्कार का आधार-स्तम्भ (pillar) है l फिर हम किस भ्रम में फंसे हैं l हमारा खुद पर जोर नहीं चलता, अपने परिवार पर जोर नहीं चलता, अपने समुदाय पर जोर नहीं चलता – तो फिर हम अन्यान्य समुदायों पर परिस्थिति की जटिलता (complexity) को समझे बिना जोर जबरदस्ती क्यों करना चाहते हैं? हम दूसरों के व्यव्हार को नहीं बदल सकते, बल्कि दूसरों के व्यव्हार के प्रति हमारी जो प्रतिक्रिया (reaction) है, हमारा कार्य क्षेत्र (scope of work) सिर्फ इस प्रतिक्रिया पर नियंत्रण हासिल करने का है, जिसमे भी हम अक्सर असफल हो जाते हैं l
 
जैनिस्तान जैसे शब्दों को इस्तेमाल करने वालों से हमें उलझना नहीं है, उनकी उपेक्षा (neglect) ही कर देनी है l वरना हम एक चक्रव्यूह (trap) में अनावश्यक रूप से फँस जाएंगे l समाज के जिन सदस्यों को बयान देना आवश्यक है उन्हें सम्पूर्ण समाज के दूरगामी (long-term) हितों को ध्यान में रखना है l स्थानीय मुद्दों में दूर बैठे लोगों को ज्यादा उकसाने (provoking) वाले वक्तव्य (statements) नहीं देने हैं l याद रखे कीमत मुंबई में रहने वाले भाई-बहन उठाएंगे l मीडिया द्वारा उत्तेजित करने के प्रयासों को भी हमें विवेकपूर्ण तरीके से समझना और अत्यंत संयम पूर्वक निपटाना है l
 
दरअसल मांस बिक्री बंदी की ये घटना इस स्वरुप में बदल जायेगी ये किसी ने नहीं सोचा था l जिनके प्रयास से ऐसा हुआ उनको भी ये आभास नहीं था मुद्दा इतना विकराल रूप ले लेगा l कुछ भ्रांतियां सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के कारण भी पैदा हो गयी जिसने गुजरात में विशिष्ट क्षेत्रों में पर्युषण के दौरान मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के फैसले को बरकरार रखा l जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग में ये लिखा है कि ये उनके जीवन का सबसे कठिन निर्णय था। उन्होंने इसके तीन कारण बताये:
 
(1) प्रतिबंध केवल 9 दिनों की छोटी अवधि के लिए लगाया गया था।
(2) अहमदाबाद सहित पश्चिमी भारत के कई हिस्सों में जैन समुदाय बड़ी संख्या में रहता है।
(3) प्रतिबंध नया नहीं था, लेकिन कई दशकों के लिए हर साल लगाया गया था। संदर्भ में सम्राट अकबर के द्वारा जैनियों के सम्मान में लिए फैसले का जिक्र किया गया था।
 
हमने सिर्फ नौ दिन वाली बात पकड़ ली और बाकि दोनों पहलुओं को गौण कर दिया। 2-4 दिन के बंद का एक स्वीकृत सिस्टम चल रहा थाl हमने उसे उद्वेलित (excited) होकर ज्यादा ही खिंच दिया l
 
दरअसल, संथारा आन्दोलन ने समाज में एक नयी उर्जा का संचार कर दिया है जिसे अगर सही दिशा नहीं दी गयी तो लोग हर बात को मुद्दा बना लेंगे और अंत में आपस में ही उलझ जाएंगे। मुक़दमे में फ़िलहाल कुछ होना नहीं है l पर हमारा हर कदम संतुलित होना चाहिए l
 
मांस बिक्री बंदी एक आँखे खोलने वाला वाकिया हैl अल्पसंख्या के कारण कुछ हिस्सों को छोड़ कर हम चुनावी सम्मिकरण (equation) में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा सकते, इस लिए राजनितिक दलों का स्वार्थ हमसे भिन्न मान्यता रखने वाले हमसे संख्या में बड़े समुदाय के विचारों की पैरवी करने में ही सिद्ध होता दिखेगा l दुसरे, मीडिया और राजनेताओं की नए मुद्दे पैदा करने की आवश्यकता भी हमारे लिए घातक बन गयी है l और तीसरे मीडिया की व्यापक पहुंच के कारण स्थानीय मुद्दे भी अब राष्ट्रिय मंच तक पहुँच जाते हैं l    
 
किसी ने व्हाट’स अप्प पर एक वाकिया बयान किया जो विचारने योग्य है l कुछ वर्षो पूर्व इन्दौर में 1 बार सामुहिक रूप से किसी समाज द्वारा मांसाहार का आयोजन एक स्कूल में रखा गया l तब उस समाज के पदाधिकारीयो से मिलने जैन समाज के बहुत से पदाधिकारी गये और उनसे कहा - "आप लोग आपके घर में चाहे जो कुछ करे हमने कभी आपसे कुछ नहीं कहा किंतु आप यहां सामुहिक रूप से मांसाहार का आयोजन न रखे हम आपसे ये विनम्रता पूर्वक विनती करने आये है, यूँ तो आप आपके कार्य के लिये स्वतंत्र है फिर भी हम आपके पास अपनी विनती लेकर आये है l"
 
तब उस समाज के लोगो ने कहा कि - "चुंकि अहिंसक जैन समाज हमारे पास ये बात लेकर आया है इसलिये हमने विचार - विमर्श करके ये निर्णय लिया है (विचार करके निर्णय करेंगे ऐसा नहीं कहा बल्कि विचार करके निर्णय लिया ये कहा) कि हम ये सामुहिक रूप से मांसाहार का आयोजन रद्द करते है l फिर जब जैन समाज के वो पदाधिकारी खुश होकर वहां से जाने लगे तब उस समाज के लोगों ने जो कहा वो बहुत सारगर्भित बात थी, उन्होने कहा कि - "क्या आपके धर्म में लिखा है कि आप रात्री भोजन नहीं कर सकते हैं?" तब जैन समाज के लोगो ने कहां कि - "हां ये सही लिखा है हमारे धर्म में l" तब उस समाज के पदाधिकारीयो ने जैन समाज से विनती करी कि - "क्या आप भी यहां ये ऐलान करके जा सकते है कि आपके समाज में सामुहिक रूप से रात्री में भोजन नहीं होगा और आप लोग कभी किसी सामुहिक रात्री भोजन में सम्मलीत नहीं होंगे l" तब वहां पर जो जैन समाज के पदाधिकारी थे वे कुछ जवाब नहीं दे पाये और नज़रे निची करते हुए सर निचा करते हुए वहां से बाहर आ गये l
 
इतना होने के बावजुद भी जैन समाज के अनुरोध पर उन्होंने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया लेकिन जैन समाज खुद के धर्म में लिखी बातो को पालने के लिये भी कुछ ना बोल सका l
 
एक ऊँगली अगर दुसरे की तरफ उठेगी तो तीन हमारी तरफ भी उठेगी l नैतिकता के पाठ पढ़ाने की मंशा रखने वाले को अपने आचरण को भी देखना होगा l
 
आवश्यकता है जैन समाज के मूल्यों को सँभालने और बचाने की l आज जैन शादियों में हमें “जैन फ़ूड काउंटर” लगाना पड़ता है, जिस पर हमारे गेस्ट पूछते हैं “बाकि खाना जैन फ़ूड नहीं है क्या?” कम से कम भाषा तो ठीक करें l चौविहार की व्यवस्था तो की जाती है, पर खाना अक्सर बर्बाद ही जाता है l
 
जैन फ़ूड और चौविहार (सूर्यास्त से पूर्व शुद्ध शाकाहारी भोजन) ससक्त जैन पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं l कम से कम सामूहिक भोजन में इनका पालन आवश्यक रूप से एवं व्यवस्थित तरीके से हमारी प्रतिष्ठा को ध्यान में रख कर यथोचित रूप से करना चाहिए l
 
आज हम अत्यंत अल्पसंख्या में सिमट कर रह गए हैं l देश की राजनीती में हमारा कोई विशेष प्रतिनिधित्व (representation) नहीं है l धर्म और जात-पात पर आधारित वोट के गणित में हम कहीं नहीं टिकते l पर स्ट्रेटेजिक तरीके से कार्य कर कर हम अपनी भूमिका को सकारात्मक रूप से (positively) महत्वपूर्ण बनाए रख सकते हैं, और देश को इसकी आवश्यकता भी है l फिर संथारा जैसे मुद्दे ने ये दिखा दिया है हमें अपने अस्तित्व को सम्हालना कितना कठिन होने वाला है l एक स्टे आर्डर को जीत मानने से बड़ी गलती नहीं हो सकती है l
 
हमें अपने अन्य देशवाशियों से सौहार्दपूर्ण तरीके से (amicably) ही पेश आना है l किसी की आँख की किरकिरी (bone of contention) नहीं बनना है l दुर्भाग्य से कुछ लोग क्षणिक राजनितिक स्वार्थों के कारण समाज के भविष्य को दाव पर लगाने में लग गएँ हैं l कुछ गुरु भगवंत भी व्यावहारिक धरातल को समझे बिना अनजाने में ही ऐसे वक्तव्य दे दे रहे हैं जो आग में घी का काम कर रहे है l
 
अन्य धर्मावलम्बी या विपरीत विचारधारा के लोग जिनका व्यवसाय या जिनकी जीवन चर्या हमारे कारण प्रभावित हो रही है – उनसे हम क्या उम्मीद रखते है? ये राजा-महाराजा वाला दौर नहीं है l मीडिया हर बात दिखलाता है, हर मुद्दे को चटखारेदार (spicy) बनाने की कोशिश करता है l कुछ लोग टीवी पर आते ही विवेक खो देते हैं l अनावश्यक ही सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में विवादों में उलझ जाते है और कीमत समाज चुकाता है l फिर बहुत से लोग उलटे पुल्टे जोशीले मेसेज भेजते रहते हैं, और बाकि उसे फॉरवर्ड करते रहते है l हम जैन हैं, संयमधारी समझे जाते हैं और सबसे पढ़ी-लिखी कौम है l हमें अपना विवेक किसी भी परिस्थिति में नहीं खोना चाहिए l

(From Rajesh kala Advocate)
 

जैन समाज  की संथारा/सल्लेखना प्रथा पर रोक लगाते राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर  सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए स्टे लगा दिया। यह संभव हुआ आप सभी के प्रयासो से, णमोकार मंत्र के जाप से, और आप सभी के मौन जुलूस मे उपस्तिथि से.
सभी को धन्यवाद एवं हार्दिक शुभकामनाए.

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सुप्रीम कोर्ट मे हाइ कोर्ट के फ़ैसेले पर स्टे लेने के लिए जैन समाज के विभिन्न संगठनो द्वारा दिनांक ३१ ऑगस्ट २०१५ को ७ अस. एल. पी. (Special Leave Petition) लगाई जाएगी. 
इसमे सफलता मिले इसी भाव से सभी लोग कल प्रात: दस बज़े से पूर्व दो घंटे सामूहिक णमोकार मंत्र का जाप क्ररे. 

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समग्र जैन समाज के सशक्तिकरण का सार्थक अभियान!

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"धर्म बचाओ आंदोलन" से जुड़ने हेतु,०९०६६०२४२०१ (09066024201) उक्त नंबर पर मिस्डकाल देवे।

Please give missed call on this number. 09066024201 to register your support for Dharm Bachao Aandolan..